अंधेरा  

Wednesday, December 24, 2008

रात मे टिमटिमाती रौशनी,
सागर के लहरों की पुकार,
अंधेरा खिंच रहा अपनी ओर,
जैसे करता हो मेरा इंतजार

कभी ये काली रौशनी लगती है नयी रात,
ना पहले उजाला था ना बाद मे कभी होगा,
ये अंधेरा अपनासा लगता है, बिछडे यारों जैसा

सच्चाई छिप जाती है,
धुंधलीसी आती है नजर,
शायद इसी वजह से हमें अंधेरा पसंद है
उजाले से बेहतर..

आंखें मुंद के देख पाते हो सपने,
जो लगते है बहोत अपने,
तो शायद आंखें खोल जी ना पायेंगे,
हम ऐसे ही गुजर जायेंगे

--स्नेहा

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बिखरे रंग तुम्हारे  

जो पढ पाते निगाहों को हमारे,
बस दिखते बिखरे रंग तुम्हारे,
उन्ही रंगोंमे रंगे है सपने हमारे,
और सपनों मे खोये हुए खयाल तुम्हारे

--स्नेहा

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क्या डरना  

पतझड़ मे गिरे पत्तों को ठिकाने से क्या डरना,
जंगल मे खिले फूल को काटोंसे क्या डरना,
यूँ तो हज़ार जख्म झेले है जिगर पे,
तो इस जमाने के सताने से क्या डरना

--स्नेहा

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मैत्रीच्या रेषा  

Monday, December 8, 2008

हरवलेले हसू जिथे पुन्हा येते फुलून
सरत जाते मळभ अन आकाश निघते उजळून,
निसटलेल्या क्षणांचे पदर येतात जुळून,
मैत्रीमध्ये रमुन जावे सारे दु:ख विसरून

जिथे जुळत जाते सार्‍या विचारांची दिशा,
मनी दाटून येते फक्त मायेची भाषा,
धिरगंभीर वड-पारंब्या रुजतात खोल जशा,
आधार वृक्ष बनून येतात मैत्रीच्या रेषा

--स्नेहा

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वो  

Saturday, December 6, 2008

खुली किताब थे हम उनके लिए,
चाहते तो पढ़ लेते थे ,
पर वो झोंके की तरह आए ,
और हमें उड़ाके चल दिए

उनकी क्या बात करें,
ना जीने ना मरने देते है,
शायरी सुन वाह वाह तो करते है,
मतलब जाने बिना चल देते है
--स्नेहा

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दोस्ती  

जीवन के सुर्ख पत्तों पे जब ये लब्ज लिखे जाते है,
उन पत्तों के नसीब खिल जाते है,
सिर्फ़ दो लब्ज है दोस्ती के ,
दो पल मे जीवन को संवार जाते है

जीवन का अटूट अंग दोस्ती,
हर पथ पर संग दोस्ती,
जब दोस्त हो आप जैसा ,
खुदा की दुवा का एक रंग दोस्ती

दोस्त तेरी हर बात हमें भाती है,
तेरी दोस्ती मे एक बहार नज़र आती है,
मिलने की आस तो ज़रूर है,
फासलों मे भी दोस्ती दिल के करीब नज़र आती है
--स्नेहा

य़े अदा है दोस्ती की
यहां दोस्ती का बसेरा है,
जिवन की अंधेरी राह मे
बस दोस्ती का ही सवेरा है

-स्नेहा

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